एक अरब से अधिक की आबादी के देश को अर्थात अमेरिकी जनसँख्या के लगभग तीन गुना को एक ऐसे भूखंड में ठूंस दिया जाय जिसका क्षेत्रफल इतना छोटा जो अमेरिका का एक तिहाई हिस्सा जितना हो, साथ में गणतांत्रिक पद्धति भी अर्थात जितने मुंह उतनी बातें हों. सबको ऊपर से नीचे तक, छोटे से बड़े तक कहीं भी कुछ भी बोलने की आज़ादी हो, मीडिया और विपक्ष को सरकारी नीतियों में हमेशा लगे कहीं दाल में काला है,तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती,
कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
तो कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है, कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है, किसी के दांत दूध के हैं ,
तो कई दूध के धुले हैं, कभी कोई चाय पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है, कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सब अपनी अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है, बावरें है.
इस अनूप का हाल तो बेहाल है, बस ये मुंह और मसूर की दाल है,
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं. लड़ झगड़ कर आज़ादी हासिल कर ली और गणतांत्रिक पद्धति अपना ली तो झेलो. अब पानी पीकर जात क्या पूछना?
कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
तो कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है, कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है, किसी के दांत दूध के हैं ,
तो कई दूध के धुले हैं, कभी कोई चाय पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है, कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सब अपनी अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है, बावरें है.
इस अनूप का हाल तो बेहाल है, बस ये मुंह और मसूर की दाल है,
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं. लड़ झगड़ कर आज़ादी हासिल कर ली और गणतांत्रिक पद्धति अपना ली तो झेलो. अब पानी पीकर जात क्या पूछना?
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