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Showing posts from 2014

पीके का आडम्बर

मैं ना पंडित और मौलवी ना मैं कोई पुजारी हूँ , अपनी देसी परम्परा का , ना ही मैं व्यापारी हूँ मैं तो एक भारतीय ठहरा , भौंचक्का हो आया हूँ , आज शाम को आमिर तेरी फिल्म देखकर आया हूँ . मेरे अपने कुछ सवाल है , ज़रा खोलकर कान सुनो , सुनो हिरानी , सुनो चोपड़ा , प्यारे आमिर खान सुनो , इस दुनिया के हर मज़हब में कहाँ नही कमियां बोलो , और अछूती रीति रिवाजों से है कब दुनिया बोलो , धर्म सनातन आडम्बर है , और कहानी गढ़ लेते , आलोचना करने से पहले गीता ही तुम पढ़ लेते , आडम्बर ही था दिखलाना , तो कुछ और बड़ा करते , हर मज़हब के आगे , इसका मुद्दा आप खड़ा करते , केवल धर्म सनातन ही क्यों तुमको चुभा बताओ जी , कहाँ नही आडम्बर , कोई मज़हब तो दिखलाओ जी , आडम्बर है यदि देव को दूध चढ़ाना , मान लिया , गौ माता को चारा देना , तिलक लगाना , मान लिया , सारी दुनिया देखी मैंने फैला बस आडम्बर है , होली ईद दीवाली फिर तो क्रिसमस भी आडम्बर है , लक्ष्मी दुर्गा शिव गणेश गर राह...

Pakistan's failed state card

Two countries were born the same year. One went to Mars and other is still struggling to keep the country intact, leave alone progress or development. In Pakistan, there are no administrators. The country is governed by impulsive corrupt leaders. There are no long term planning. They do make plans but it gets derailed half way because of corruption and loot everywhere in the name of religion, political party, army or foreign relations. Their own failures to provide good governance to the people are attributed to mostly foreign powers or neighbors. That's the easiest excuse to remain in power. Priority is to build untainted judiciary, infrastructure and provide good education. In order to get these things done, country needs investment. Who is going to invest into projects in a country where violence, terrorism, and religious fundamentalism are order of the day? But then here is the catch. Pakistan   has long proved to be adept at diplomatically levering its weakness into strengt...

तुम्हारी तस्वीर

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मेरे लिए वर्ण अपनी ध्वनि खो बैठे हैं बहुत देर से मैं अब लिखता नहीं- तुम्हारे धूपिया अंगों की सिर्फ़ परछाईं पकड़ता हूँ । कभी तुमने देखा है- लकीरों को बगावत करते ? कोई भी अक्षर मेरे हाथों से तुम्हारी तस्वीर बन कर ही निकलता है.....- अनूप 

इंशा अल्लाह ......

कत्ले आम इंसानियत, उन सबसे बेख़बर  बस आँखे बंद करो, बोलो, अल्लाहो अकबर दनदनाती गोलियाँ हलाक होते बच्चे,  मजहबी बने,  घूम रहे लफंगे और लुच्चे खौफ, खून, हर तरफ तबाही का मंज़र ,  कल तक तक तो सिडनी, और आज है पेशावर कोई तो बताये, अरे कोई समझाए क्या इसी का नाम मजहब , क्या इस्लाम इसका नाम ? अब अनूप इन सवालों पर  गोलियों से हो न एहतराम लेकर  परचम  मोहब्बत का  भज ले हरे राम हरे राम। 

जीवन साथी

उम्र ओस की बूंद सी भाप बन उड़ जाती है ,बालों में चांदनी सी खिलती है और घुटने के दर्द में अपना वजूद छोड़ जाती है इसी समय सही मायने में जीवन साथी की सबसे अधिक जरूरत होती है और उसके साथ छूटने का डर भी सबसे ज्यादा होता है

Traveller

O traveller! it's a long journey and there is no respite. lots of temptation, but you have to fight your journey takes you to site with many splendid suns and moons some are dim and some are bright. gaze in wonder constant struggle, men and women slogging day and night teary eyes but strong spirit all along the journey gave a new insight. Life is a journey without any pause however shortlived life would be you can live for a good cause.  Anup.

CLOUDS

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dark clouds dark clouds, what in your store? I hear some lightning and thunderous roar. parched land yearn for pouring rain bring some relief to hot summer pain.-Anup.

हया

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निगाहें ना फेरो, ना चेहरा छुपाओ देर तलक दूर रही पास आ जाओ जो आँखों में बसा है मुझे सब पता है वो रंगीन सपने सपनों में अपने दिलकश अदाएं छुप छुप इशारे खिलखिलाती हंसी में क्या कुछ छिपा है, मुझे सब पता है खुल गए राज, अब पास आ जाओ, हया में अपनी मुहब्बत न छुपाओ .....अनूप

दरिंदे

कभी संतों की वाणी कभी प्रेमी की कसमें घात लगाये रहता, वो अलग अलग रंग में कभी संत और महात्मा, कभी यार होता है वो बहुरूपी  वहशी कलाकार होता है दरिंदों का नहीं कोई भेष होता है न देश होता है ना परदेश  होता है...- अनूप

कविता की सौगात

कविता ज़िन्दगी की कडुवाहट में मिठास लाती है  हिज्र की उदास रात में चाँद सी खूशबू लाती है  जिस ख्वाब को देखते वह अकेली छत पे चल रही होती  कविता उस ख्वाब को तुमसे जोड़ तन्हाई में रंग लाती है -अनूप 

कालचक्र

कल तक जो एक भव्य महल था, जीवन नृत्य था आँगन में , आज सिसकती भग्न दीवारें सन्नाटा है प्रांगण में दुःख और खुशियों का परचम जीवन में लहराता है फिर फिर जीना फिर फिर मरना काल चक्र दुहराता है -अनूप 

बहुत देर कर दी राधिके !

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आज तुम आयी हो फिर, झुकी पलकों में छिपाये उन अजनबी ख्वाबों का कारवां लिए ऐसा लगता है थम गयी मेरी उम्र थम गया समय  पर क्या समय किसी के लिए ठहरा है? या फिर उस पर किसी का पहरा है जो बीत गयी वो बात गयी समय का इशारा है इसलिए कहता हूँ बहुत देर कर दी राधिके पनघट तक आते आते बहुत शिद्दत से सम्हाले रखा उन मखमली लम्हों का खज़ाना यकीं न हो तो जाओ छूकर देखो उसी जगह आज भी उस दीवार पर सिलवटें पड़ी है हमारे तुम्हारे गुफ्तगू के लहरदार लमहों की, और जिसकी छाप आज भी तुम्हारे होठों की थिरकनो में तुम्हे मिलेगी पर इन बातों से समय का कोई सरोकार नहीं समय का इशारा है इसलिए कहता हूँ बहुत देर कर दी राधिके पनघट तक आते आते तुम्हारी आस में देखी कई सावन की अठखेलियां और जेठ कि तपती दुपहरिया इक कुम्हलाई हुई याद, एक धुंधला सपना एक युग बीता संजोते संजोते मैं भी मौन रहा और तुम भी चल दिए मुस्कराके हंसके बहुत देर कर दी राधिके पनघट तक आते आते