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पान सिंह तोमर

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फिल्म की शुरुआत में ही एक गजब का संवाद है..जब पत्रकार पानसिंह से पूछता है कि आप कैसे एक धावक से डकैत बने...जिस में पानसिंह का जबाव कि '' डकैत नहीं , बागी..डकैत तो देश की संसद में बैठते है"। पान सिंह तोमर का यह डायलॉग अभी भी कानों में गूँज रहा है। हिंदुस्तान की ज़मीनी सच्चाई से जुडी और कमजोर य्ववस्था और भ्रष्ट अधिकारियों के कारण चम्बल के बीहड़ में धकेले गए एक धावक के डाकू बनने की कहानी -अरसे बाद इतनी खुबसूरत फिल्म देखने को मिली। मुख्य कलाकार इरफ़ान के अलावा जिस दूसरे कलाकार ने प्रभावित किया- वोह हैं पत्रकार की भूमिका में ब्रिजेंदर काला . मुझे लगा की आज मैंने क्रिसमस की छुट्टी का सही इस्तेमाल किया।

सफेदपोश लूटेरे

संसद में जिन्हें समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र ध्वज की गरिमा बढाने के लिए भेजा जता है, वे रातों रात लुटेरे बन कर करोड़ों की संपत्ति बना लेते हैं। इनके इस कुकृत्य से क्या राष्ट्र का अपमान नहीं होता? कोई गाँधी का नाम लेता है, कोई दलितों की सेवा का स्वांग रचता है और कोई हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का राग छेड़ता है। पर मकसद सबका देश सेवा नहीं बल्कि अपना और अपने परिवार की स्वार्थ साधना रहता है। ये सफ़ेद पोश लुटेरे देश को दीमक की तरह खा चुके और संसद को बंधक बना दिया है। कैसा लोकतंत्र और कैसा स्वराज? कोई अगर देश की वर्तमान परिस्थिति की बात कार्टून की भाषा में करता है तो वो देशद्रोही कहलाता है। पेश आया दुश्मनों की तरह शख्स जो मिला  मैं हब्शियों के शहर में क्यूँ आइना हुआ।