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Showing posts from June, 2014

दरिंदे

कभी संतों की वाणी कभी प्रेमी की कसमें घात लगाये रहता, वो अलग अलग रंग में कभी संत और महात्मा, कभी यार होता है वो बहुरूपी  वहशी कलाकार होता है दरिंदों का नहीं कोई भेष होता है न देश होता है ना परदेश  होता है...- अनूप

कविता की सौगात

कविता ज़िन्दगी की कडुवाहट में मिठास लाती है  हिज्र की उदास रात में चाँद सी खूशबू लाती है  जिस ख्वाब को देखते वह अकेली छत पे चल रही होती  कविता उस ख्वाब को तुमसे जोड़ तन्हाई में रंग लाती है -अनूप