अरे भाई, नया साल आया है, ज़रा परे हटना, आज मैं ज़ल्दी में हूँ, ज़रा परे हटना. सुना पुराने साल ने ख़ुदकुशी कर ली, कोई बताये, क्या है माज़रा, ज़रा परे हटना. शक है नए साल ने ही कुछ खुराफाती की है, उसकी जामातलाशी ले लूं, ज़रा परे हटना. सबको भरमाता पुराना साल नए चोले में किसी बहुरूपिये की तरह अभी आया है, चुनावी मौसम में जैसे किसी धूर्त नेता की तरह पुरानी शराब नयी बोतल में ले आया है. यही बताने इधर आया हूँ, ज़रा परे हटना. नया साल आया है, ज़रा परे हटना, तुम किसी गफलत में नहीं रहना, साल के आखिर में फुर्र हो जायेगा, अभी जितनी मर्ज़ी छलावा मदहोश कर दे साल ढलते नशा काफूर हो जाएगा. होशो हवाश की बात हो रही यहाँ, ज़रा परे हटना नया साल आया है, ज़रा परे हटना, आज की सुबह का ऐतबार मत करना कल आते ही दम तोड़ देगी. सबको आगाह कर दूं जल्दी से, ज़रा परे हटना. दोस्त सभी दिल से निकले मेरे सन्देश का इंतज़ार कर रहे, ज़रा परे हटना, ज़ल्दी से कॉपी पेस्ट के लुभावने सन्देश चुन लूं, ज़रा परे हटना. अरे भाई, नया साल आया है, ज़रा परे हटना,
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स्वागत है आपका, आइये पधारिये, दायें बाएं देखकर आप भी बिराजिये, रंगीन है चश्मा तो उसे फिर उतारिये बिना लाग लपेट के यूँ ही निहारिये. मुल्क ये हसीन और बहुत संस्कारी है, साधू है, साध्वी है, नेता व्यापारी है. गणतंत्री जलसे की सुगबुगाहट जारी है संसद के आसपास भीड़ बहुत भारी है. गाँव और गलियों में मंच और वक्ता है, भीड़ को जुटाने में लाभकारी भत्ता है, रंगे पुते मुखड़े हैं, नाच है नचनिया है, बगुलों के ग्रास हेतु, तैरती मछलियाँ है. कोई है लूटता और कोई लुट रहा, अस्मत कहीं तो कहीं, राजकोष लुट रहा . वादे हैं कसमे हैं, शोर है तमाशा है, रंगे सियार हैं, लुभावनी भाषा है. नौटंकी कलाकार, चोर और उचक्के कुछ गूंगे बहरे, कुछ कच्चे पक्के आलू टमाटर है, अदरख और लहसन है. दलित और शोषित है, मुल्ले बिरहमन है जुलूस है ईद का, राम की सवारी है दंगों की आग है, लाशों की क्यारी है. मुल्क ये हसीन और बहुत संस्कारी है, गाय और गोबर है, सांप और मदारी है. कहीं कुछ लड़कियां और बलात्कारी हैं आसन की मुद्रा में योग के व्यापारी हैं. फिरते हैं बहुरूपिये छटा बड़ी न्या...
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I do not try to legitimize rape culture here but I strongly disagree with the views of someone who blame Mr Modi who himself denounced the crime and said, "As a country, as a society we all are ashamed of it (rapes)." Prevention of crimes against women, children come under state jurisdiction and law enforcement agencies have an important role to play here. Our world today is in moral decline. Have you ever heard toddlers are raped or father impregnated his own daughter. Yes, such disgusting and heart wrenching crimes are taking place all over the world at a fast pace. To combat challenges of this nature, we have to start from the family. Charity begins at home. Try to be a role model. Educational institutions should be upgraded with qualified educators with clean background. Law enforcement agencies are to be overhauled. Before hiring policeman, there must be a through background check. Increase night patrolling and surveillance cameras should be engaged. Rapists should have...
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बलात्कार जैसे कुकृत्यों से ले कर पुलिस अधिकारियों के पास आये फरियादियों के साथ गाली गलौच अश्लील भाषा - ये कौन लोग हैं, ये कैसा मुल्क़ है? क्या एक अकेला मोदी इस पतनशील जर्जर संस्कृति का ह्रास रोक सकेगा? लोग कितने संवेदनहीन और जंगली हो चले हैं। अरे भाई सूरज (मोदी) कहाँ आ गए इन निशाचरों के बीच, किसी को नहीं तुम्हारी रोशनी की ज़रूरत है, अँधेरा फलता फूलता यहाँ, रुको तुम, अभी सब शिकार में बहुत व्यस्त है।
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एक अरब से अधिक की आबादी के देश को अर्थात अमेरिकी जनसँख्या के लगभग तीन गुना को एक ऐसे भूखंड में ठूंस दिया जाय जिसका क्षेत्रफल इतना छोटा जो अमेरिका का एक तिहाई हिस्सा जितना हो, साथ में गणतांत्रिक पद्धति भी अर्थात जितने मुंह उतनी बातें हों. सबको ऊपर से नीचे तक, छोटे से बड़े तक कहीं भी कुछ भी बोलने की आज़ादी हो, मीडिया और विपक्ष को सरकारी नीतियों में हमेशा लगे कहीं दाल में काला है,तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती, कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है, तो कोई लोहे के चने चबाता है, कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है, कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है, कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है, किसी के दांत दूध के हैं , तो कई दूध के धुले हैं, कभी कोई चाय पानी करवाता है, कोई मख्खन लगाता है, कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है, किसी के मुंह में घी शक्कर है, सब अपनी अपनी बीन बजाते है, पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है , सभी बहरे है, बावरें है. ...
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हजारों मील दूर अमेरिका में बैठे मैं जब बसीरहाट के दंगों की खबरें सुनता हूँ तो मुझे कुछ आश्चर्य नहीं लगता. ये बचपन के दिनों के “जेमिनी सर्कस” का अलग अलग जगहों में प्रदर्शन की याद दिलाता है. सोचता हूँ तो लगता है उसी तरह के सर्कस की पुनरावृत्ति है. ये लोग पहले सताये गए, मारे गए, "जंग, भूख और बीमारी से बचा लो" का विलाप करते किसी भारत, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया अथवा अमेरिका में शरणार्थी का चोला पहन प्रवेश करेंगे. ये किसी भी रूप में हो सकते हैं- बांग्लादेशी, सीरियन अथवा रोहिंग्या मुस्लिम (उस कारवां में शरणार्थियों का मुखोटा लगाये पाकिस्तानी अवश्य मिलेंगे)। स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएँ, मानवाधिकार संगठन औऱ कुछ वोट बैंक पाने के लोभी राजनीतिक पार्टियां उनके समर्थन में प्रदर्शन कर सुर्खियाँ बटोरेंगे। उसके बाद ये “दले कुचले” लोग उस मुल्क़ में प्रवेश कर अपने को स्थापित करेंगे। अपनी संख्या बढ़ाएंगे। फिर मस्जिद, शरिया कानून, बुर्का प्रथा, तलाक़ तलाक़ तलाक़, मदरसा औऱ अजान की गूंज सुनाई देने लगेगी। ISIS के परचम दिखेंगे और जिहाद की कसमें खाई जाएंगी। बम हथियारों का प्रवेश पिछले दरवाज़े से होता रहेगा। कुछ सु...