सब चलता है

पीछे मुड़ कर देखें जब भी, भूली बिसरी यादें बन कर
उमड़ घुमड़ कर खट्टी मीठी तस्वीरों का हुआ नज़ारा।
ऐसी ही तस्वीरों में हम देखें तरह तरह के खेल.
चोर चोर मौसेरे भाई आपस में है इनका मेल
समझौतों में छूपा है रहता कई सियासी घालम पेल
जीत चुनाव इस बार अभी तू, कल हो जाना फिर तू फेल
भ्रष्टाचार, घोटाला कर लो काला धन स्विस बैंक में भर लो
सीबीआई की जांच करा लो हाथ नहीं कछु आना
सैयां है कोतवाल, रे मूरख! डर छिप कर क्या खाना
लूटो, खाओ, हरियाली है, बाद में न पछताना
पांच साल में आता फिर फिर महा पर्व का मेला
गंगा में डुबकी लगाओ रहो न तुम अकेला
जाति धरम का छौंक लगाओ भेदभाव की अलख जगाओ
पाप छुपाओ, पुण्य कमाओ उचित समय है ना शर्माओ
देश की जनता ऐसी भोली उनको समझ ना आये
काठ की हांडी चढ़ी आग में देख देख भरमाये
जले न हांड़ी बिलकुल लेकिन बन जाए पकवान
खेल ये कैसा चोर पुलिस का लोग हैं सब हैरान.
राजनीति के चक्रव्यूह को नहीं समझेगा तू रे अनूप,
वोट मांगते भिखमंगों को, पद देता है  दिव्य स्वरुप
कौन पक्ष है यहाँ बेचारा
कौन है जीता कौन है हारा
गूंगी बस्ती, बहरा नेता
अंधे दर्शक, नहीं सहारा
दांव पेंच का खेल है यारा,
परदे पीछे, काम है सारा
सफेदपोश गुंडे और स्वामी
नेतागण कुछ नामी गरामी
सब की मिलीभगत है इसमें
सबने  लूटा, किसने सँवारा।


ईश्वर हमको दिशा दिखाएँ
कहाँ है नैया, कहाँ किनारा।

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