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Showing posts from June, 2015

गली से उठता धुआं......

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घर भर के लिए हर सुबह खुशियां पकाती है, सबक जिंदगी का है, वो स्कूल नहीं जाती है. टेडी बेयर उसके खिलोनों का हिस्सा नहीं, किस्मत में परी जगत का कोई किस्सा नहीं. सफ़ेद झालरों वाली फ्रॉक नहीं उसके पास, फिर भी कोई कड़वाहट नहीं उसके पास. वो कोमल फूल सी नहीं है, क्या करें, वो ज़िन्दगी की धूल है, क्या करें. उसकी दुनिया में बचपन का बसेरा नहीं होता, अंधेरों की जकड़ ऐसी, कभी सबेरा नहीं होता. रसोई उसका क्रीडांगन, हांड़ी तवा खिलौना है, थकी हारी जहाँ नींद मिले, वहीँ उसका बिछोना है. पूरी नींद सोती नहीं, अपनी किस्मत पे कभी रोती नहीं. ऐसी दुनिया भी दाता तेरी क्यूँ होती है, कहीं लबालब उजाला, तो कहीं रात होती है.

मैथ क्लास

मैथ टीचर  बड़े बेरहम होते हैं अंको को कुतरते है कुचलते है ब्लैक बोर्ड में सजाते हैं और फिर हमसे पूछते हैं, फलां नंबर ने फलां से क्यूँ दोस्ती की फलां उसकी खिड़की में क्यूँ झाँकता अगर लड़की की जगह उसका बाप होता तो तापमान की कितनी डिग्री से उसको आँकता बाप की भृकुटियों में कितनी रेखाएं खिंचती और वे कैसी होती - वक्र होती या सरल कितने अंकों की पिटाई होती और भूकंप के किस स्तर का होता वहां हलचल ? चलो अगर लड़की ही झलक दिखलाती तो कितने प्रतिशत का प्रेम में उछल आता? कौन किसके चेहरे पे गुलाबीपन लाता? अरे ये टीचर तो जरा आशिकी मिजाज़ के लगते हैं अलजेब्रा ज्योमेट्री गणित के इनके सारे सवाल लैला मजनू की खिड़की से गुजरते है अच्छा अब राहत मिली, इन्होने सवाल की दिशा बदल दी सामने वाली खिड़की को बंद कर एक नयी पहल की सवाल इनका दिशाहीन था, अब दिशा दी इन्होने दिशा समस्या का पिटारा खोला उंघते शिष्यों का नब्ज़ टटोला अब दिशा खंगालने लगे, सवाल कुछ उड़ने लगे सवाल हर दिशा से हम पर जड़ने लगे कभी पूरब दिशा को दक्षिण से जोड़ते हैं पश्चिम दिशा को जादुई मोड़ देते हैं फिर पू...

रंगों की बेरहमी

रंगों की बेरहमी भी देखें किस कदर सरे आम होती है कालों को काला रंग और अक्सर गरीबी भी देती है जैसे करेले पे नीम चढ़ा बदनसीबी से लबालब है घड़ा काला रंग कृष्ण से लेकर मंडेला सब पर है चढ़ा. कृष्ण की लीला थी, बंसी थी, गोपिकाएं थी उसके रंग को भक्तों ने सींचा, ग्रंथों ने पाला. पर बेचारे मंडेला को सारी ज़िन्दगी नस्ल भेद से लड़ना पड़ा कालों की बस्ती को दूसरों ने हमेशा जानवरों सा दर्जा दिया क्या ये कहर काफी नहीं उनके लिए उस पर फिर मुफलिसी ऊपर से, क्या चार चाँद लगाती है कालों की गरीबी बड़ी भयानक होती है लूली लंगड़ी होती है, बदसूरती की हद को पार शर्मनाक होती है सब उनके कर्मों का फल होता है, हत्यारे बलात्कारी गुंडे लूटेरे होते है बीमारियाँ पनपती है धरती का कोढ़ होती है. वहां दिन का उजाला नहीं होता हमेशा रात होती है. पर यहाँ की बात ही कुछ और उन पर यदा कदा ही गरीबी नुमाइश लगाती है. नुमाइश इस क़दर खुबसूरत कि तंगहाली में भी चांदनी सी रौनक होती है, भीगी हुई आँखों में एक नीली झील सी होती है जहाँ डूबने डूबाने की बात होती है अक्सर इनायत बरसाने की होड़ होती है कुछ पा लेने की जद्दो जहद होती है ...