हजारों मील दूर अमेरिका में बैठे मैं जब बसीरहाट के दंगों की खबरें सुनता हूँ तो मुझे कुछ आश्चर्य नहीं लगता. ये बचपन के दिनों के “जेमिनी सर्कस” का अलग अलग जगहों में प्रदर्शन की याद दिलाता है. सोचता हूँ तो लगता है उसी तरह के सर्कस की पुनरावृत्ति है. ये लोग पहले सताये गए, मारे गए, "जंग, भूख और बीमारी से बचा लो" का विलाप करते किसी भारत, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया अथवा अमेरिका में शरणार्थी का चोला पहन प्रवेश करेंगे. ये किसी भी रूप में हो सकते हैं- बांग्लादेशी, सीरियन अथवा रोहिंग्या मुस्लिम (उस कारवां में शरणार्थियों का मुखोटा लगाये पाकिस्तानी अवश्य मिलेंगे)। स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएँ, मानवाधिकार संगठन औऱ कुछ वोट बैंक पाने के लोभी राजनीतिक पार्टियां उनके समर्थन में प्रदर्शन कर सुर्खियाँ बटोरेंगे। उसके बाद ये “दले कुचले” लोग उस मुल्क़ में प्रवेश कर अपने को स्थापित करेंगे। अपनी संख्या बढ़ाएंगे। फिर मस्जिद, शरिया कानून, बुर्का प्रथा, तलाक़ तलाक़ तलाक़, मदरसा औऱ अजान की गूंज सुनाई देने लगेगी। ISIS के परचम दिखेंगे और जिहाद की कसमें खाई जाएंगी। बम हथियारों का प्रवेश पिछले दरवाज़े से होता रहेगा। कुछ सुसाइड दल के मतवाले हूरों को पा लेने की बेताबी में मासूम लोगों का क़त्ल करेंगे। इनका काम बदस्तूर चलता रहेगा। इस बीच इन सब पर पर्दा डालने और भाई चारे के मौसम को बुलाने के लिए कुछ प्रेम और सद्भाव के गीत गाये जाएंगे। चुनाव के लिए वोट बैंक की नींव मजबूत होगी। ढोंग करते कुछ “बुद्धिजीवी” वर्ग सुर्खियां बटोरेंगे। फिर दंगे फ़साद होंगे, घर और संपत्तियां जलाई जाएगी। इसपे उसपे उंगलियां उठेंगी। “हम होंगे कामयाब” की तर्ज पे शांति मार्च होंगे, कुछ मोमबत्तियां जलेंगी. ग्राउंड जीरो में कर्तव्यनिष्ठ TV चैनल्स के कैमरा और रिपोर्टरों की भीड़ अपनी TRP के लिए ईमानदारी से एक दुसरे को धकम पेल करते दिखाई देगी. दिल पे मत ले यार. कसम से, इस नौटंकी की पटकथा मैंने नहीं लिखी।

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