कालचक्र

कल तक जो एक भव्य महल था, जीवन नृत्य था आँगन में ,
आज सिसकती भग्न दीवारें सन्नाटा है प्रांगण में
दुःख और खुशियों का परचम जीवन में लहराता है
फिर फिर जीना फिर फिर मरना काल चक्र दुहराता है -अनूप 

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