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Showing posts from August, 2011

मैं हूँ अन्ना

तरस आता है उन लोगों पर जो अन्ना और उनके समर्थकों के विरोध प्रदर्शन से उठे सैलाब को महज़ दो टके की भीड़ का नाम देते हैं. लगता है जन आन्दोलन करना और सामाजिक सुधार के विषयों से सम्बंधित बहस में शामिल होने का ठेका सिर्फ दिल्ली में बैठे कुछ खास वर्ग और उनके चमचों को ही है. जब इन लोगों की यह ठेकेदारी उनके हाथ से खिसकती आम जनता के हाथ में दिखाई देती है तो उन जैसे ख़ास लोगों को बड़ी तकलीफ होती है. एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाजुओं को देख, पतवारे न देख.

द्रौपदी का चीरहरण

आँखों से अंधे और सत्ता के मोह में कानों से बहरे हो चुके धृतराष्ट्र की सभा थी. सभा में द्रोणाचार्य भी थे, कृपाचार्य भी थे और हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधे रहने का अभिमान रखने वाले पितामह भीष्म भी थे. द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, किन्तु सभी स्वनामधन्य लोग मौन थे और द्रौपदी बिलख-बिलख कर हर एक से पूछ रही थी की इस अपराध का दोषी कौन है ? किन्तु किसी का मौन नहीं टूटा बल्कि सभी के सर झुके हुए थे. उसी वक़्त महात्मा विदुर ने कहा था की एक तिहाई दोष अपराधी का , एक तिहाई उसके सहयोगियों का और एक तिहाई उसका जो इस जघन्य अपराध के घटित होने पर मौन है. कुछ ऐसी ही स्थिति आज अपने महान देश की भी है. प्रधानमंत्री मौन है, राष्ट्रपति मौन है और उपराष्ट्रपति चुप है और आज़ादी के दस वर्षों में से अधिकांश समय तक देश पर राज करने का दंभ भरने वाले नेहरु वंशावली के युवराज और राजमाता भी मौन है. आज देश भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबा है. नित नए घोटाले उजागर हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट तक परेशान है मगर हमारे देश के कर्णधार अपनी ही रौ में मस्त है. हमारी सरकार धृतराष्ट्र बनी हुई है. बकौल एक कवि : किले पर लाल कोई गिद्ध जब स...