दरिंदे

कभी संतों की वाणी कभी प्रेमी की कसमें
घात लगाये रहता, वो अलग अलग रंग में
कभी संत और महात्मा, कभी यार होता है
वो बहुरूपी  वहशी कलाकार होता है
दरिंदों का नहीं कोई भेष होता है
न देश होता है ना परदेश  होता है...- अनूप

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