तुम्हारी तस्वीर

मेरे लिए वर्ण अपनी ध्वनि खो बैठे हैं बहुत देर से
मैं अब लिखता नहीं- तुम्हारे धूपिया अंगों की सिर्फ़
परछाईं पकड़ता हूँ ।

कभी तुमने देखा है- लकीरों को बगावत करते ?
कोई भी अक्षर मेरे हाथों से

तुम्हारी तस्वीर बन कर ही निकलता है.....-अनूप 

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