इंशा अल्लाह ......

कत्ले आम इंसानियत, उन सबसे बेख़बर 
बस आँखे बंद करो, बोलो, अल्लाहो अकबर
दनदनाती गोलियाँ हलाक होते बच्चे, 
मजहबी बने,  घूम रहे लफंगे और लुच्चे
खौफ, खून, हर तरफ तबाही का मंज़र , 
कल तक तक तो सिडनी, और आज है पेशावर
कोई तो बताये, अरे कोई समझाए
क्या इसी का नाम मजहब ,
क्या इस्लाम इसका नाम ?
अब अनूप इन सवालों पर 

गोलियों से हो न एहतराम
लेकर परचम मोहब्बत का 
भज ले हरे राम हरे राम। 

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