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गली से उठता धुआं......

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घर भर के लिए हर सुबह खुशियां पकाती है, सबक जिंदगी का है, वो स्कूल नहीं जाती है. टेडी बेयर उसके खिलोनों का हिस्सा नहीं, किस्मत में परी जगत का कोई किस्सा नहीं. सफ़ेद झालरों वाली फ्रॉक नहीं उसके पास, फिर भी कोई कड़वाहट नहीं उसके पास. वो कोमल फूल सी नहीं है, क्या करें, वो ज़िन्दगी की धूल है, क्या करें. उसकी दुनिया में बचपन का बसेरा नहीं होता, अंधेरों की जकड़ ऐसी, कभी सबेरा नहीं होता. रसोई उसका क्रीडांगन, हांड़ी तवा खिलौना है, थकी हारी जहाँ नींद मिले, वहीँ उसका बिछोना है. पूरी नींद सोती नहीं, अपनी किस्मत पे कभी रोती नहीं. ऐसी दुनिया भी दाता तेरी क्यूँ होती है, कहीं लबालब उजाला, तो कहीं रात होती है.

मैथ क्लास

मैथ टीचर  बड़े बेरहम होते हैं अंको को कुतरते है कुचलते है ब्लैक बोर्ड में सजाते हैं और फिर हमसे पूछते हैं, फलां नंबर ने फलां से क्यूँ दोस्ती की फलां उसकी खिड़की में क्यूँ झाँकता अगर लड़की की जगह उसका बाप होता तो तापमान की कितनी डिग्री से उसको आँकता बाप की भृकुटियों में कितनी रेखाएं खिंचती और वे कैसी होती - वक्र होती या सरल कितने अंकों की पिटाई होती और भूकंप के किस स्तर का होता वहां हलचल ? चलो अगर लड़की ही झलक दिखलाती तो कितने प्रतिशत का प्रेम में उछल आता? कौन किसके चेहरे पे गुलाबीपन लाता? अरे ये टीचर तो जरा आशिकी मिजाज़ के लगते हैं अलजेब्रा ज्योमेट्री गणित के इनके सारे सवाल लैला मजनू की खिड़की से गुजरते है अच्छा अब राहत मिली, इन्होने सवाल की दिशा बदल दी सामने वाली खिड़की को बंद कर एक नयी पहल की सवाल इनका दिशाहीन था, अब दिशा दी इन्होने दिशा समस्या का पिटारा खोला उंघते शिष्यों का नब्ज़ टटोला अब दिशा खंगालने लगे, सवाल कुछ उड़ने लगे सवाल हर दिशा से हम पर जड़ने लगे कभी पूरब दिशा को दक्षिण से जोड़ते हैं पश्चिम दिशा को जादुई मोड़ देते हैं फिर पू...

रंगों की बेरहमी

रंगों की बेरहमी भी देखें किस कदर सरे आम होती है कालों को काला रंग और अक्सर गरीबी भी देती है जैसे करेले पे नीम चढ़ा बदनसीबी से लबालब है घड़ा काला रंग कृष्ण से लेकर मंडेला सब पर है चढ़ा. कृष्ण की लीला थी, बंसी थी, गोपिकाएं थी उसके रंग को भक्तों ने सींचा, ग्रंथों ने पाला. पर बेचारे मंडेला को सारी ज़िन्दगी नस्ल भेद से लड़ना पड़ा कालों की बस्ती को दूसरों ने हमेशा जानवरों सा दर्जा दिया क्या ये कहर काफी नहीं उनके लिए उस पर फिर मुफलिसी ऊपर से, क्या चार चाँद लगाती है कालों की गरीबी बड़ी भयानक होती है लूली लंगड़ी होती है, बदसूरती की हद को पार शर्मनाक होती है सब उनके कर्मों का फल होता है, हत्यारे बलात्कारी गुंडे लूटेरे होते है बीमारियाँ पनपती है धरती का कोढ़ होती है. वहां दिन का उजाला नहीं होता हमेशा रात होती है. पर यहाँ की बात ही कुछ और उन पर यदा कदा ही गरीबी नुमाइश लगाती है. नुमाइश इस क़दर खुबसूरत कि तंगहाली में भी चांदनी सी रौनक होती है, भीगी हुई आँखों में एक नीली झील सी होती है जहाँ डूबने डूबाने की बात होती है अक्सर इनायत बरसाने की होड़ होती है कुछ पा लेने की जद्दो जहद होती है ...

नेपाल का भूकम्प

नेपाल और उसके पास के क्षेत्रों में भूकम्प (April 25, 2015)  से फैली तबाही से मर्माहत हुँ. मेरे उद्गार ईश्वर के प्रति : देखते देखते ये क्या हुआ हमारे तुम्हारे साथ ये क्या हुआ इतना बड़ा हादसा क्यों कर कैसे हुआ लोग कहते हैं मुहब्बत जागी टेकटोनिक प्लेट में और यहाँ ज़िन्दगी तबाह हुई हमको दिखता है लेकिन फरेब तेरी खुदाई का इस तबाही के गर्द गुबारों में खंडित हुए मंदिरों में और उसमे दबे देवी देवताओं में चीखती माँओं की पुकारों में, बिलखते परिजनों की सिसकियों में कंधो में ढोई गयी लाशों में ज़िंदा दम घोंट दिए मासूमों में हमको दिखता है लेकिन फरेब तेरी खुदाई का .

अरविन्द मियां

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के वर्तमान मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी मीडिया की सुर्ख़ियों में है. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि केजरीवाल ने अपने ऊँचे ऊँचे चुनावी वादों को स्वर्ग से दिल्ली की धरती पे उतारा हो. बल्कि उनके कुछ अनुयायियों ने उनके स्टिंग हथियार को उन पर ही चला दिया. नतीजा केजरीवाल बेनक़ाब हुए. अर्थात अपने शपथ गीत के द्वारा भाईचारा और प्रेम के सन्देश से भीड़ को भावविभोर करने वाले दिल्ली के सुससंस्कृत से दिखनेवाले केजरीवाल कमीने, साले, लात मारना आदि अपशब्दों से अपने कुछ वरिष्ठ साथियों को अलंकृत करते स्टिंग के चपेट में फँस गए. इससे कुछ सप्ताह पहले उनके  एक और साथी ने स्टिंग कर चुनाव आचार संहिता और धर्मनिरपेक्ष बातों से लुभाने वाले खुद अपने चुनाव में मुसलिम कैंडिडेट तोड़ो निर्देश देते हुए पकड़े गये. योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण तमाम उनके आलोचकों को पार्टी कार्यकारिणी से निकाला गया. मुख्यमंत्री बनने के बाद एक तानाशाही चेहरा लोगों के सामने आया. इसी परिप्रेक्ष्य में निम्नलिखित पंक्तियाँ कुमार विश्वास की शैली मे. कोई कमीना कहता है, कोई साला समझता है !  मगर क...

अल्लाह के बन्दे

ओ अल्लाह के बन्दे, ओ मेरे मुस्लिम भाई, आप से जब जब मिला आपने दी सफाई, इस्लाम है अमन का, सिखाता नहीं लड़ाई, एक बात बतलाओगे, समझाओगे  फिर कहाँ से सीखा मासूमों का क़त्ल करना, और कहाँ से ये बेरहमी आई।

सब चलता है

पीछे मुड़ कर देखें जब भी, भूली बिसरी यादें बन कर उमड़ घुमड़ कर खट्टी मीठी तस्वीरों का हुआ नज़ारा। ऐसी ही तस्वीरों में हम देखें तरह तरह के खेल. चोर चोर मौसेरे भाई आपस में है इनका मेल समझौतों में छूपा है रहता कई सियासी घालम पेल जीत चुनाव इस बार अभी तू, कल हो जाना फिर तू फेल भ्रष्टाचार, घोटाला कर लो काला धन स्विस बैंक में भर लो सीबीआई की जांच करा लो हाथ नहीं कछु आना सैयां है कोतवाल, रे मूरख! डर छिप कर क्या खाना लूटो, खाओ, हरियाली है, बाद में न पछताना पांच साल में आता फिर फिर महा पर्व का मेला गंगा में डुबकी लगाओ रहो न तुम अकेला जाति धरम का छौंक लगाओ भेदभाव की अलख जगाओ पाप छुपाओ, पुण्य कमाओ उचित समय है ना शर्माओ देश की जनता ऐसी भोली उनको समझ ना आये काठ की हांडी चढ़ी आग में देख देख भरमाये जले न हांड़ी बिलकुल लेकिन बन जाए पकवान खेल ये कैसा चोर पुलिस का लोग हैं सब हैरान. राजनीति के चक्रव्यूह को नहीं समझेगा तू रे अनूप, वोट मांगते भिखमंगों को, पद देता है  दिव्य स्वरुप कौन पक्ष है यहाँ बेचारा कौन है जीता कौन है हारा गूंगी बस्ती, बहरा नेता अंधे दर्शक, नहीं सहारा दांव पेंच क...