रंगों की बेरहमी

रंगों की बेरहमी भी देखें किस कदर सरे आम होती है
कालों को काला रंग और अक्सर गरीबी भी देती है
जैसे करेले पे नीम चढ़ा
बदनसीबी से लबालब है घड़ा
काला रंग कृष्ण से लेकर मंडेला सब पर है चढ़ा.
कृष्ण की लीला थी, बंसी थी, गोपिकाएं थी
उसके रंग को भक्तों ने सींचा, ग्रंथों ने पाला.
पर बेचारे मंडेला को सारी ज़िन्दगी नस्ल भेद से लड़ना पड़ा
कालों की बस्ती को दूसरों ने हमेशा जानवरों सा दर्जा दिया
क्या ये कहर काफी नहीं उनके लिए
उस पर फिर मुफलिसी ऊपर से, क्या चार चाँद लगाती है
कालों की गरीबी बड़ी भयानक होती है
लूली लंगड़ी होती है, बदसूरती की हद को पार शर्मनाक होती है
सब उनके कर्मों का फल होता है, हत्यारे बलात्कारी गुंडे लूटेरे होते है
बीमारियाँ पनपती है धरती का कोढ़ होती है.
वहां दिन का उजाला नहीं होता हमेशा रात होती है.
पर यहाँ की बात ही कुछ और
उन पर यदा कदा ही गरीबी नुमाइश लगाती है.
नुमाइश इस क़दर खुबसूरत कि तंगहाली में भी
चांदनी सी रौनक होती है,
भीगी हुई आँखों में एक नीली झील सी होती है
जहाँ डूबने डूबाने की बात होती है
अक्सर इनायत बरसाने की होड़ होती है
कुछ पा लेने की जद्दो जहद होती है
लूटने लूटाने की क़वायद होती है,
गरीबी चुन चुन कर चुनाव करती है
किसी के पास फटकती भी नहीं
और कहीं ज़िन्दगी भर की कोढ़ होती है

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