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बहुत देर कर दी राधिके !

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आज तुम आयी हो फिर, झुकी पलकों में छिपाये उन अजनबी ख्वाबों का कारवां लिए ऐसा लगता है थम गयी मेरी उम्र थम गया समय  पर क्या समय किसी के लिए ठहरा है? या फिर उस पर किसी का पहरा है जो बीत गयी वो बात गयी समय का इशारा है इसलिए कहता हूँ बहुत देर कर दी राधिके पनघट तक आते आते बहुत शिद्दत से सम्हाले रखा उन मखमली लम्हों का खज़ाना यकीं न हो तो जाओ छूकर देखो उसी जगह आज भी उस दीवार पर सिलवटें पड़ी है हमारे तुम्हारे गुफ्तगू के लहरदार लमहों की, और जिसकी छाप आज भी तुम्हारे होठों की थिरकनो में तुम्हे मिलेगी पर इन बातों से समय का कोई सरोकार नहीं समय का इशारा है इसलिए कहता हूँ बहुत देर कर दी राधिके पनघट तक आते आते तुम्हारी आस में देखी कई सावन की अठखेलियां और जेठ कि तपती दुपहरिया इक कुम्हलाई हुई याद, एक धुंधला सपना एक युग बीता संजोते संजोते मैं भी मौन रहा और तुम भी चल दिए मुस्कराके हंसके बहुत देर कर दी राधिके पनघट तक आते आते

नव वर्ष

नव वर्ष की सुबह और खौलती चाय की खूशबू, गर्म गर्म भाप, थोड़ी शीतलता लिए मेरे गालों से लिपटी। मैंने कहा, नव वर्ष मंगलमय हो, खौलती चाय ने जवाब में कहा - बुड़बुड़, बुड़बुड़। छोटी मुस्कराहट लम्बी सोच बन गयी। नव वर्ष क्या होता है ? मैंने समझने की कोशिश की। नए साल को सूंघा, छुआ और थपथपाया नया तो कुछ भी नहीं पाया। नया साल किसी बेशर्म छात्र की तरह, थोड़ी सी उपलब्धियों की  बैसाखी लिए बढ़ता है नए पायदान , पाता है नयी जगह जैसे किसी शासक वंश की निकम्मी संतान योग्यता की छाती को रौंदकर बनायी अपनी पहचान। हिंसा, भ्रष्टाचार है फैला नारी का होता अपमान ऐसी दुनिया चीख चीख कर पूछे तुमसे एक सवाल कितनी ढिठाई है तुममे, नया साल किसके माथे छोड़ आये दुनिया के वो सारे बवाल? सुना है वैटिकन की आवाज़ वादियों से टकराती है फिर फिर लौट आती है। मुल्लाओं की धर्मान्धता ऐसी कि अब भी स्कूली बच्चे अपने ही चिपचिपे खून से लथपथ किताबें डरे सहमे खोलते हैं। इंशाल्लाह पोलिओ के टीके अब नहीं दिए जाते मलाला भी और अब जन्म नहीं लेती। सुना है तुम मुज़फ्फरनगर के दंगों के शिकार लोगों को राजीनीतिक दलदल में सर्...
It's been snowing since early morning and I remain indoors watching snow falling outside. In such fleeting moments like the ribbon of snow flakes wafting aimlessly in the air and disappears, a thought of companionship crossed my mind and didn't stay long enough. What do you want?, I asked myself. x% of me wants to be free, x%wants to get married, x%longs for a spiritual life, x% wants children...I answered. Hmm..."Looks like you have a finger in every pie.". But I still don't know how to resolve this uncertainty. I have put this decision on the long finger. Please keep your finger crossed for me. Oh! all this time I was oblivious of the fact that I have an injured finger.
कांग्रेस के पास टीवी स्क्रीन में सुशोभित होने  और देश विदेश के  नेताओं के साथ  हाथ मिलाते  मुस्कराते खुबसूरत एक ख़ास वंश के  चेहरे हैं, वंशवाद को पनपाने के लिए चाटूकारियों का रेलम पेल है , भ्रष्टाचार की फ़ेहरिश्त है, सरकार को समर्थन देने वाले कुछ भ्रष्ट नेताओं के लिए   " लाइन में बने रहो वरना सीबीआई आ जाएगा"  वाली डरावनी लोरी भी है, विशेष प्रकार की करामाती कठपुतलियाँ है जिसकी डोर "ऊपर वाले" के हाथों   से बंधी है और राष्ट्रवाद को "कम्युनल" कहने का दर्शन उनके पास है। फिर   नरेन्द्र के मोदी की क्या बिसात कि  वे राजमाता और युवराज से टकराए? ये बहस तो बेमानी है।

पान सिंह तोमर

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फिल्म की शुरुआत में ही एक गजब का संवाद है..जब पत्रकार पानसिंह से पूछता है कि आप कैसे एक धावक से डकैत बने...जिस में पानसिंह का जबाव कि '' डकैत नहीं , बागी..डकैत तो देश की संसद में बैठते है"। पान सिंह तोमर का यह डायलॉग अभी भी कानों में गूँज रहा है। हिंदुस्तान की ज़मीनी सच्चाई से जुडी और कमजोर य्ववस्था और भ्रष्ट अधिकारियों के कारण चम्बल के बीहड़ में धकेले गए एक धावक के डाकू बनने की कहानी -अरसे बाद इतनी खुबसूरत फिल्म देखने को मिली। मुख्य कलाकार इरफ़ान के अलावा जिस दूसरे कलाकार ने प्रभावित किया- वोह हैं पत्रकार की भूमिका में ब्रिजेंदर काला . मुझे लगा की आज मैंने क्रिसमस की छुट्टी का सही इस्तेमाल किया।

सफेदपोश लूटेरे

संसद में जिन्हें समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र ध्वज की गरिमा बढाने के लिए भेजा जता है, वे रातों रात लुटेरे बन कर करोड़ों की संपत्ति बना लेते हैं। इनके इस कुकृत्य से क्या राष्ट्र का अपमान नहीं होता? कोई गाँधी का नाम लेता है, कोई दलितों की सेवा का स्वांग रचता है और कोई हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का राग छेड़ता है। पर मकसद सबका देश सेवा नहीं बल्कि अपना और अपने परिवार की स्वार्थ साधना रहता है। ये सफ़ेद पोश लुटेरे देश को दीमक की तरह खा चुके और संसद को बंधक बना दिया है। कैसा लोकतंत्र और कैसा स्वराज? कोई अगर देश की वर्तमान परिस्थिति की बात कार्टून की भाषा में करता है तो वो देशद्रोही कहलाता है। पेश आया दुश्मनों की तरह शख्स जो मिला  मैं हब्शियों के शहर में क्यूँ आइना हुआ।
दिल्ली हाई कोर्ट के बम धमाकों से विचलित हूँ. इस हादसे में मारे गए लोगों के परिवारों को मेरी संवेदना. भारत सरकार अपनी जनता से दुर्व्यवहार और चरमपंथियों से नरम व्यवहार करती है. उनका कहना है कि उन्हें रामदेव के आंदोलन में हिंसा की ख़ुफिया जानकारी थी, लेकिन उन्हें दिल्ली के बम धमाकों में लिप्त आतंकवादियों की कोई पूर्व सूचना नहीं थी.