नव वर्ष
नव वर्ष की सुबह और खौलती चाय की खूशबू,
गर्म गर्म भाप, थोड़ी शीतलता लिए मेरे गालों से लिपटी।
मैंने कहा, नव वर्ष मंगलमय हो,
खौलती चाय ने जवाब में कहा - बुड़बुड़, बुड़बुड़।
छोटी मुस्कराहट लम्बी सोच बन गयी।
नव वर्ष क्या होता है ?
मैंने समझने की कोशिश की।
नए साल को सूंघा, छुआ और थपथपाया
नया तो कुछ भी नहीं पाया।
नया साल किसी बेशर्म छात्र की तरह,
थोड़ी सी उपलब्धियों की बैसाखी लिए
बढ़ता है नए पायदान , पाता है नयी जगह
जैसे किसी शासक वंश की निकम्मी संतान
योग्यता की छाती को रौंदकर बनायी अपनी पहचान।
हिंसा, भ्रष्टाचार है फैला
नारी का होता अपमान
ऐसी दुनिया चीख चीख कर पूछे तुमसे एक सवाल
कितनी ढिठाई है तुममे, नया साल
किसके माथे छोड़ आये दुनिया के वो सारे बवाल?
सुना है वैटिकन की आवाज़ वादियों से टकराती है
फिर फिर लौट आती है।
मुल्लाओं की धर्मान्धता ऐसी कि अब भी स्कूली बच्चे
अपने ही चिपचिपे खून से लथपथ किताबें डरे सहमे खोलते हैं।
इंशाल्लाह पोलिओ के टीके अब नहीं दिए जाते
मलाला भी और अब जन्म नहीं लेती।
सुना है तुम मुज़फ्फरनगर के दंगों के शिकार लोगों को
राजीनीतिक दलदल में सर्दी में ठिठुरते बेसहारा छोड़ आये
कश्मीरी पंडितों को बेघर कर आये
अब कोई खेमका और दुर्गा की पौध नहीं सींचता।
समाज के उन उजियाले गलियारों में जहाँ रोशनी नहीं जाती
दामिनी के दामन को नापाक करने वाले वीभत्स पशु
आज भी हुंकार भरते हुए बेलगाम पाये जाते हैं
सीरिया सूडान और अनगिनत जगहों में
मौत का आर्तनाद और ताबड़तोड़ हिंसक ताण्डव जारी
क्या कुछ भी बदला ?
नहीं,फिर भी तुम चले आये नए लिबास और चोले में
सबको ध्रुपद और ठुमरी का लय दे कर आत्मसात किया
भ्रमित किया, सम्मोहित किया।
मंच तैयार किया, भ्रष्टाचार सुशोभित किया।
नया साल आया है , जश्न मनाना है
पर रुको, ठहरो, अपने कीचड़ सने पैरों से
इस सुन्दर कालीन को पंकमय मत करना।
मैं अनंत काल हूँ , मुझ पर नव वर्ष के सुनहरे पैबंद मत जड़ना।
नववर्ष मनाएं तो ये सन्देश ज़रूर पढ़ना
प्रेम की सुगंध ही जीवन का मर्म हो।
मानव बस एक जाति, प्रेम ही इक धर्मं हो।
गर्म गर्म भाप, थोड़ी शीतलता लिए मेरे गालों से लिपटी।
मैंने कहा, नव वर्ष मंगलमय हो,
खौलती चाय ने जवाब में कहा - बुड़बुड़, बुड़बुड़।
छोटी मुस्कराहट लम्बी सोच बन गयी।
नव वर्ष क्या होता है ?
मैंने समझने की कोशिश की।
नए साल को सूंघा, छुआ और थपथपाया
नया तो कुछ भी नहीं पाया।
नया साल किसी बेशर्म छात्र की तरह,
थोड़ी सी उपलब्धियों की बैसाखी लिए
बढ़ता है नए पायदान , पाता है नयी जगह
जैसे किसी शासक वंश की निकम्मी संतान
योग्यता की छाती को रौंदकर बनायी अपनी पहचान।
हिंसा, भ्रष्टाचार है फैला
नारी का होता अपमान
ऐसी दुनिया चीख चीख कर पूछे तुमसे एक सवाल
कितनी ढिठाई है तुममे, नया साल
किसके माथे छोड़ आये दुनिया के वो सारे बवाल?
सुना है वैटिकन की आवाज़ वादियों से टकराती है
फिर फिर लौट आती है।
मुल्लाओं की धर्मान्धता ऐसी कि अब भी स्कूली बच्चे
अपने ही चिपचिपे खून से लथपथ किताबें डरे सहमे खोलते हैं।
इंशाल्लाह पोलिओ के टीके अब नहीं दिए जाते
मलाला भी और अब जन्म नहीं लेती।
सुना है तुम मुज़फ्फरनगर के दंगों के शिकार लोगों को
राजीनीतिक दलदल में सर्दी में ठिठुरते बेसहारा छोड़ आये
कश्मीरी पंडितों को बेघर कर आये
अब कोई खेमका और दुर्गा की पौध नहीं सींचता।
समाज के उन उजियाले गलियारों में जहाँ रोशनी नहीं जाती
दामिनी के दामन को नापाक करने वाले वीभत्स पशु
आज भी हुंकार भरते हुए बेलगाम पाये जाते हैं
सीरिया सूडान और अनगिनत जगहों में
मौत का आर्तनाद और ताबड़तोड़ हिंसक ताण्डव जारी
क्या कुछ भी बदला ?
नहीं,फिर भी तुम चले आये नए लिबास और चोले में
सबको ध्रुपद और ठुमरी का लय दे कर आत्मसात किया
भ्रमित किया, सम्मोहित किया।
मंच तैयार किया, भ्रष्टाचार सुशोभित किया।
नया साल आया है , जश्न मनाना है
पर रुको, ठहरो, अपने कीचड़ सने पैरों से
इस सुन्दर कालीन को पंकमय मत करना।
मैं अनंत काल हूँ , मुझ पर नव वर्ष के सुनहरे पैबंद मत जड़ना।
नववर्ष मनाएं तो ये सन्देश ज़रूर पढ़ना
प्रेम की सुगंध ही जीवन का मर्म हो।
मानव बस एक जाति, प्रेम ही इक धर्मं हो।
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