नव वर्ष
नव वर्ष की सुबह और खौलती चाय की खूशबू, गर्म गर्म भाप, थोड़ी शीतलता लिए मेरे गालों से लिपटी। मैंने कहा, नव वर्ष मंगलमय हो, खौलती चाय ने जवाब में कहा - बुड़बुड़, बुड़बुड़। छोटी मुस्कराहट लम्बी सोच बन गयी। नव वर्ष क्या होता है ? मैंने समझने की कोशिश की। नए साल को सूंघा, छुआ और थपथपाया नया तो कुछ भी नहीं पाया। नया साल किसी बेशर्म छात्र की तरह, थोड़ी सी उपलब्धियों की बैसाखी लिए बढ़ता है नए पायदान , पाता है नयी जगह जैसे किसी शासक वंश की निकम्मी संतान योग्यता की छाती को रौंदकर बनायी अपनी पहचान। हिंसा, भ्रष्टाचार है फैला नारी का होता अपमान ऐसी दुनिया चीख चीख कर पूछे तुमसे एक सवाल कितनी ढिठाई है तुममे, नया साल किसके माथे छोड़ आये दुनिया के वो सारे बवाल? सुना है वैटिकन की आवाज़ वादियों से टकराती है फिर फिर लौट आती है। मुल्लाओं की धर्मान्धता ऐसी कि अब भी स्कूली बच्चे अपने ही चिपचिपे खून से लथपथ किताबें डरे सहमे खोलते हैं। इंशाल्लाह पोलिओ के टीके अब नहीं दिए जाते मलाला भी और अब जन्म नहीं लेती। सुना है तुम मुज़फ्फरनगर के दंगों के शिकार लोगों को राजीनीतिक दलदल में सर्...