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कांग्रेस के पास टीवी स्क्रीन में सुशोभित होने  और देश विदेश के  नेताओं के साथ  हाथ मिलाते  मुस्कराते खुबसूरत एक ख़ास वंश के  चेहरे हैं, वंशवाद को पनपाने के लिए चाटूकारियों का रेलम पेल है , भ्रष्टाचार की फ़ेहरिश्त है, सरकार को समर्थन देने वाले कुछ भ्रष्ट नेताओं के लिए   " लाइन में बने रहो वरना सीबीआई आ जाएगा"  वाली डरावनी लोरी भी है, विशेष प्रकार की करामाती कठपुतलियाँ है जिसकी डोर "ऊपर वाले" के हाथों   से बंधी है और राष्ट्रवाद को "कम्युनल" कहने का दर्शन उनके पास है। फिर   नरेन्द्र के मोदी की क्या बिसात कि  वे राजमाता और युवराज से टकराए? ये बहस तो बेमानी है।

पान सिंह तोमर

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फिल्म की शुरुआत में ही एक गजब का संवाद है..जब पत्रकार पानसिंह से पूछता है कि आप कैसे एक धावक से डकैत बने...जिस में पानसिंह का जबाव कि '' डकैत नहीं , बागी..डकैत तो देश की संसद में बैठते है"। पान सिंह तोमर का यह डायलॉग अभी भी कानों में गूँज रहा है। हिंदुस्तान की ज़मीनी सच्चाई से जुडी और कमजोर य्ववस्था और भ्रष्ट अधिकारियों के कारण चम्बल के बीहड़ में धकेले गए एक धावक के डाकू बनने की कहानी -अरसे बाद इतनी खुबसूरत फिल्म देखने को मिली। मुख्य कलाकार इरफ़ान के अलावा जिस दूसरे कलाकार ने प्रभावित किया- वोह हैं पत्रकार की भूमिका में ब्रिजेंदर काला . मुझे लगा की आज मैंने क्रिसमस की छुट्टी का सही इस्तेमाल किया।

सफेदपोश लूटेरे

संसद में जिन्हें समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र ध्वज की गरिमा बढाने के लिए भेजा जता है, वे रातों रात लुटेरे बन कर करोड़ों की संपत्ति बना लेते हैं। इनके इस कुकृत्य से क्या राष्ट्र का अपमान नहीं होता? कोई गाँधी का नाम लेता है, कोई दलितों की सेवा का स्वांग रचता है और कोई हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का राग छेड़ता है। पर मकसद सबका देश सेवा नहीं बल्कि अपना और अपने परिवार की स्वार्थ साधना रहता है। ये सफ़ेद पोश लुटेरे देश को दीमक की तरह खा चुके और संसद को बंधक बना दिया है। कैसा लोकतंत्र और कैसा स्वराज? कोई अगर देश की वर्तमान परिस्थिति की बात कार्टून की भाषा में करता है तो वो देशद्रोही कहलाता है। पेश आया दुश्मनों की तरह शख्स जो मिला  मैं हब्शियों के शहर में क्यूँ आइना हुआ।
दिल्ली हाई कोर्ट के बम धमाकों से विचलित हूँ. इस हादसे में मारे गए लोगों के परिवारों को मेरी संवेदना. भारत सरकार अपनी जनता से दुर्व्यवहार और चरमपंथियों से नरम व्यवहार करती है. उनका कहना है कि उन्हें रामदेव के आंदोलन में हिंसा की ख़ुफिया जानकारी थी, लेकिन उन्हें दिल्ली के बम धमाकों में लिप्त आतंकवादियों की कोई पूर्व सूचना नहीं थी.

मैं हूँ अन्ना

तरस आता है उन लोगों पर जो अन्ना और उनके समर्थकों के विरोध प्रदर्शन से उठे सैलाब को महज़ दो टके की भीड़ का नाम देते हैं. लगता है जन आन्दोलन करना और सामाजिक सुधार के विषयों से सम्बंधित बहस में शामिल होने का ठेका सिर्फ दिल्ली में बैठे कुछ खास वर्ग और उनके चमचों को ही है. जब इन लोगों की यह ठेकेदारी उनके हाथ से खिसकती आम जनता के हाथ में दिखाई देती है तो उन जैसे ख़ास लोगों को बड़ी तकलीफ होती है. एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाजुओं को देख, पतवारे न देख.

द्रौपदी का चीरहरण

आँखों से अंधे और सत्ता के मोह में कानों से बहरे हो चुके धृतराष्ट्र की सभा थी. सभा में द्रोणाचार्य भी थे, कृपाचार्य भी थे और हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधे रहने का अभिमान रखने वाले पितामह भीष्म भी थे. द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, किन्तु सभी स्वनामधन्य लोग मौन थे और द्रौपदी बिलख-बिलख कर हर एक से पूछ रही थी की इस अपराध का दोषी कौन है ? किन्तु किसी का मौन नहीं टूटा बल्कि सभी के सर झुके हुए थे. उसी वक़्त महात्मा विदुर ने कहा था की एक तिहाई दोष अपराधी का , एक तिहाई उसके सहयोगियों का और एक तिहाई उसका जो इस जघन्य अपराध के घटित होने पर मौन है. कुछ ऐसी ही स्थिति आज अपने महान देश की भी है. प्रधानमंत्री मौन है, राष्ट्रपति मौन है और उपराष्ट्रपति चुप है और आज़ादी के दस वर्षों में से अधिकांश समय तक देश पर राज करने का दंभ भरने वाले नेहरु वंशावली के युवराज और राजमाता भी मौन है. आज देश भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबा है. नित नए घोटाले उजागर हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट तक परेशान है मगर हमारे देश के कर्णधार अपनी ही रौ में मस्त है. हमारी सरकार धृतराष्ट्र बनी हुई है. बकौल एक कवि : किले पर लाल कोई गिद्ध जब स...

Dhanyavad

भई, यह तो कमाल हो गया। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इतने सहज तरीके से मैं अपनी मातृभाषा में अपनी बात इन्टरनेट के जरिये कह सकूं। किसको और कैसे मैं अपनी शुक्रिया अदा करूं । असंख्य धन्यवाद !!! अध्यक्ष